ॐ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
श्री विजयादशमी उत्सव, नागपुर
(आश्विन शु. 10 युगाब्द 5128 – मंगलवार दिनांक 20 अक्तूबर 2026)
स्मरण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के कार्यक्रमों के समापन के अवसर पर विजयादशमी उत्सव मनाने के लिए हम आज यहां एकत्रित हैं। यह वर्ष संत शिरोमणि रविदास जी महाराज के 650 वे जन्म जयंती वर्ष के निमित्त कार्यक्रमों का वर्ष है। संघ शाखाओं में भी इस अवसर पर संत रविदास जी के जीवन और कार्य की जानकारी देने वाले कार्यक्रम हो रहे हैं। उनके द्वारा परिश्रम, तपस्या, त्याग, व स्वयं के जीवन के उदाहरण से समाज में भक्ति, स्वधर्मनिष्ठा तथा सामाजिक समरसता का भाव जागरण, ऐसे समय किया गया, जब देश विदेशी आक्रान्ताओं के एतद्देशीय धर्म को मानने वाले देशवासियों पर अत्याचार से पीड़ित था । स्वयं के उपदेश तथा जीवन से संत रविदास जी की दी हुई सीख आज भी हम सबके लिए प्रेरक तथा पथदर्शक है । स्वधर्म रक्षा के लिए ही जिन महापुरुषों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया ऐसे दो महापुरुषों के भी स्मरण का यह वर्ष है । आर्यसमाज के तपस्वी संन्यासी, प्रखर धर्माभिमानी, ज्ञानी शिक्षाविद्, वीर स्वातंत्र्यसेनानी तथा शुद्धि आन्दोलन के जनक स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान को 100 साल पूरे हुए । उत्कल के वन प्रदेश में स्वयं रहकर जिन्होंने वहां के अपने समाज की नि:स्वार्थ सेवा की और वहीं पर अपना बलिदान भी दिया ऐसे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी महाराज की भी जन्म शताब्दी चल रही है । जिस स्व की रक्षा के लिए इन महापुरुषों के बलिदान हुए, उसी आत्मबोध को समाज में स्वदेशी मेलों के द्वारा जागृत करने का प्रयास करने वाले ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक व प्रवर्तक, बंग भूमि के स्वर्गीय श्रीमान राज नारायण बसु के भी जन्म का 200 वा वर्ष चल रहा है ।
संघ का कार्य भी गत 100 वर्षों से भारत को इसी स्व के, अस्मिता के, ethos के आधार पर संगठित व बलसंपन्न करने के लिये चला है । संघ की शतकपूर्ति के उपलक्ष्य में, जीवनपरिवर्तन की कारक जिन पांच पहलों को, पहले स्वयंसेवकों में प्रवर्तित किया गया व बाद मे समाज में स्वयंसेवक प्रवर्तित करेंगे, उन में एक यही स्व का बोध व स्वदेशी के आचरण की पहल है।
अपने ‘स्व’ बोध की नींव
हमने अपने देश के संविधान में अपने आप को एक प्रजा के रूप मे, विविधता के बावजूद भावनात्मक दृष्टि से एकरस समाज के रूप में, ‘हम भारत के लोग’ ऐसा, संबोधित किया है । उस भावनात्मक बंधन को उत्तरोत्तर दृढ़ बनाते जाने का दिग्दर्शन भी स्पष्ट शब्दों में उसी संविधान के मार्गदर्शक तत्त्वों में है । उस भावनात्मक बंधन को जिस तत्व की प्रत्यक्ष अनुभूति जन्म देती है, वह अनुभूति तथा उसे स्पष्ट करने वाला विश्व का सर्वोत्कृष्ट तत्वज्ञान हमारे पास होनेपर भी; हमारा व्यवहार उससे एकदम अलग और निकृष्ट हुआ । इसीलिए विश्वगुरु पद से हम इतने नीचे गिरते आए कि अनेक शतकों तक हमें गुलामी झेलनी पड़ी । अनेक भीमप्रयासों से तथा बलिदानों से उन दुर्दिनों से मुक्त होकर अब हम फिर एक बार अपनी एकता व प्रगति की राह पर चल पड़े है । इसलिए हमें अपनी विस्मृति को दूर कर उस तत्व को भी स्पष्ट रूप से समझना पड़ेगा, मन से स्वीकार करना पड़ेगा तथा उसके अनुरूप गुणवत्ता का स्वयं के जीवन के सभी आयामों में निर्माण करना पड़ेगा । देश की स्वाधीनता के लिये जितनी तपस्या व समर्पण हुआ उससे कहीं अधिक की आवश्यकता अब पड़ेगी, यह परिस्थिति को हम देखते हैं तो ध्यान में आता है ।
भारत जैसे, मत, पंथ, संप्रदाय, प्रान्त, जाति, भाषा, खानपान, रीतिरिवाज, आदि विविधताओं से भरपूर देश में जो विचार इन सभी को स्वीकार करता है, सम्मान देता है, अपनेपन से देखता है, वही हमारी एकता का आधार बन सकता है । सौभाग्य से भारत में सनातन काल से चलती आई परम्परा, जो अनेक आध्यात्मिक महापुरुषों की प्रत्यक्ष अनुभूतियों से निरन्तर स्पष्ट व पुष्ट होती आयी है, वह हमें बताती है कि सृष्टि की विविधता जितनी स्वाभाविक परन्तु परिवर्तनशील है उतनी ही सम्पूर्ण अस्तित्व की एकता शाश्वत, अटल व अचल सत्य है । मनुष्य विचारशील प्राणी होने के नाते उस एकता को स्वयं में तथा जगत में अनुभव कर सकता है । यह करने से ही शाश्वत व नित्य सुख के खोज की जीवमात्र की यात्रा सफल व पूर्ण होती है।
“इसी सत्य को विविध पक्ष से
वेदों में हमने गाया था,
निकट बिठाकर इसी तत्व को
उपनिषदों में समझाया था ।
मंदिर - मठ - गुरुद्वारे जाकर
यही ज्ञान सत्संग मिलेगा,”
सभी विविधताओं का सम्मान, स्वीकार, करते हुए उन को संरक्षण देने का भारत का स्वभाव तथा जो परिवर्तनीय एवं/अथवा कालविसंगत है उसे बदलते रहने का लचीलापन इसी सनातन दृष्टि का परिणाम है । जब-जब भारत के जनों में यह भाव सर्वोच्च रहा तब-तब भारत विश्व का सभी दृष्टि से आदर्श राष्ट्र रहा । जब आत्मविस्मृति, विघटन व परस्पर संपर्क टूटने के कारण हम बलहीन, संकुचित, अहंकारी अथवा भयग्रस्त हो गये, हमने इस आचरण को त्याग दिया, तब हमारी दुर्गति हुई । हमें अपने अस्तित्व व अस्मिता के इस आधार को फिर से स्मरण करते हुए संगठित व परस्पर हित के लिए कटिबद्घ होना होगा ।
संघ शताब्दी के कार्यक्रम
शताब्दी के निमित्त संघ की शाखाओं के व स्वयंसेवकों के संपर्क के विस्तार के लिए कार्यक्रम किये गए । साथ साथ देश में तथा विश्व में भी भारत, हिन्दू व संघ के बारे में व्यापक प्रबोधन की योजना को भी क्रियान्वित किया गया । कार्यक्रमों का अबतक प्राप्त हुआ वृत्त इस प्रकार है—- संपर्क अभियान – 4,61,527 ग्रामों एवं 41,076 नगरीय बस्तीयों में 10,19,88,511 घरों में संपर्क किया गया । प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी –1,117 जिलों में हुए गोष्ठियों में 4,26,497 नागरिक (महिला + पुरुष) उपस्थित रहे । सद्भावना बैठक – 5,036 खण्डों में संपन्न हुई । हिन्दू सम्मलेन – 34,187 मंडलों में समपन्न हुए । युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवा उपथित रहे।
संघ के कुछ कार्यकर्ताओं के प्रवास पश्चिम के तथाकथित विकसित देशों में भी वहां के समाजों में भारत, हिंदुत्व तथा संघ के बारे में सही जानकारी देने की दृष्टि से हुए । वहां भी हमारी सनातन, सर्वसद्भावी भारतीय संस्कृति, हिन्दुसमाज की सर्वसमावेशकता, तथा संघ के उद्देश्य व कार्य की सही व सत्य जानकारी सब के सम्मुख रखी गयी । विश्व में भारत के प्रति एक कुतूहल जाग रहा है । जड़वाद, व्यक्तिवाद तथा संयम रहित उपभोग पर आधारित अधूरी दृष्टि के कारण भौतिक दृष्टि से सम्पन्न होते हुए भी वे देश चिंता में हैं । विविधताओं को कैसे संभालना, विकास व पर्यावरण को कैसे साथ चलाना, जो अपने जैसे नही है उनसे अपनेपन से कैसे बरतना, कुटुंबजीवन के तथा नई पीढ़ियों में संस्कारों के क्षरण को कैसे रोकना आदि समस्याओं का उत्तर उनके पास नहीं है । इसीलिए विश्व आज भूराजनैतिक तनावों के, आर्थिक अनिश्चितता के, पर्यावरणीय संकट के और वर्चस्व की लड़ाई में विनाश को देख रहा है । भारत के पास इन सब समस्याओं के सारे उत्तर हैं यह वे जानते हैं । इस लिए हमारे कार्यकर्ताओं के कथनों को वहां अच्छी तरह सुना गया, व चर्चाएं भी चल पड़ी है । देश में तथा विश्व में शताब्दी के निमित्त प्रारम्भ हुआ सब प्रकार का संवाद आगे भी सतत व निरंतर चलता रहे ऐसी योजना बनाने में कार्यकर्ता लगे हैं ।
पञ्च परिवर्तन की पाचों पहलों का यथा – समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व बोध व स्वदेशी और नागरिक अनुशासन – समाज के सभी वर्गों तथा स्तरों में स्वागत हुआ है । विश्व के अन्य देशों में भी इसकी आवश्यकता अनुभव की गयी है । यह केवल एक वर्षभर का कार्यक्रम नहीं अपितु जीवन में आचरण का परिवर्तन लाने वाली व्यवहार की शैली है । प्रत्यक्ष कृति से आदत व आदतों से स्वभाव बनाने वाले यह कार्य जीवन के सभी आयामों में सतत चलाने होंगे, तब परिवर्तन आयेगा । हमारे समाज में संस्कारों के द्वारा इस प्रकार के, विश्व की धारणा करने वाले धार्मिक जीवन की आदतों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता रहा है ।
विवेकशील आचरण की आवश्यकता
वर्तमान काल में परिवार के बड़ों से, विद्यालयों के पाठ्यक्रम से अथवा समाज के वातावरण से यह संस्कार मिलना दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है । विज्ञान और तकनीकी की प्रगति के कारण सब प्रकार की जानकारी, समाचार समाज माध्यमों के द्वारा सबको मिलती है । अनेक देशों में नई पीढ़ी को उन माध्यमों से मिलती हुई जानकारी बिना उचित-अनुचित का विवेक किये नई पीढ़ी ग्रहण करती है । उसके दुष्परिणामों का अनुभव ले चुकने के बाद उन देशों ने उन माध्यमों पर कुछ अनुशासन और निर्बंध लागू किये है । हमारे अपने देश में भी इस प्रकार की आवश्यकता, विशेषत: ‘OTT platforms’ को लेकर, समाज में अनुभव की जा रही है । शासन प्रशासन को इसका विचार करना चाहिये । साथ ही जानकारी स्वैर रूप में मिलती हो तो भी उचित-अनुचित का विवेक करना नई पीढ़ी को सिखाना पड़ेगा । उस विवेक के अनुपस्थिति के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में कई प्रकार के दुष्परिणाम देखने को मिलते है । इस विवेक के अभाव में ही विश्वभर में नई पीढ़ी नशीली दवाओं की आदत की शिकार हो रही है । नशा एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है और उसके परिहार के लिए समय रहते शासन-प्रशासन तथा समाज को प्रयास प्रारम्भ करने चाहिए । समाज की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को यह विवेक नई पीढ़ी को देना पड़ेगा व नई पीढ़ी को अपनेआप को ऐसी आदत निर्माण करने वाले सभी प्रवृत्तियों से दूर रखना पडेगा । इस दृष्टी से भारत में इस समस्या का निराकरण करने वाले सभी को साथ लेकर देशभर में इस समस्या का निरास करने वाला एक देशव्यापी प्रतिरोध खडा हो इसलिए स्वयंसेवक प्रयास करेंगे ।
आने वाले समय में परमवैभव संपन्न विश्वगुरु भारत के निर्माण का बड़ा दायित्व नई पीढ़ी के कंधे पर ही आने वाला है । इस चुनौती को स्वीकार कर सफलता पूर्वक उसका उत्तर देने के लिए हमारे युवाओं को सब प्रकार से सन्नद्ध होना चाहिए।
संतुलित व समग्र विकास की दृष्टि
विज्ञान और तकनीकी की प्रगति मनुष्यों को भौतिक दृष्टि से सुखी जीवन जीने में, जीवन में ज्ञान और तर्क के आधार पर अपने व्यवहार को निर्दोष करने में मदद करती है । इसलिए नए ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी का स्वागत और स्वीकार करना चाहिए । परन्तु यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तकनीकी केवल साधन है । केवल उपभोगवादी अथवा जड़वादी दृष्टिकोण से विकास होता है तो सुख सुविधा के साथ उससे बड़ी हानी मोल लेनी पड़ती है । हाल ही में नेपाल में जिस भयंकर त्रासदी को झेलना पडा, हजारों मनुष्यों की बली चढ़ गयी, उसके मूल में कहीं ना कहीं सम्पूर्ण हिमालय के क्षेत्र में जो भारत, तिब्बत, भूतान, चीन ऐसे अनेक देशों से गुजरता है, में चले ऐसे एकांगी विकास का परिणाम है । इतनी बड़ी मात्रा में मनुष्य हानी का दु:ख हम सभी को अनुभव होता है और त्रासदी के बाद के पीड़ितों को राहत पहुंचाना आदि कार्यों में तो हम सब लगते ही है परन्तु विकास की समग्र व संतुलित दृष्टि निर्माण होना आवश्यक है । साधन का योग्य दिशा में उपयोग करने वाला, उपयोग के औचित्य, अनौचित्य को तय करने वाला तो मनुष्य होता है । इसलिए ज्ञान के या तकनीकी के साथ-साथ ही उसका उचित उपयोग हो ऐसा विवेक और उसके उपयोग का नैतिक व भौतिक अनुशासन भी सीखकर आचरण में लाना चाहिए । अन्यथा परमाणुओं के रचना के ज्ञान से स्वच्छ ऊर्जा से ज्यादा जीवन संहारक अस्त्र निकलेंगे व कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे अत्यंत उपयोगी तंत्रज्ञान से भी मनुष्य को भ्रमित करने वाले, ठगने वाले, झूठ के उपक्रम निकलते रहेंगे ।
भारत की सनातन, अपनी समग्रता व एकात्मकता के कारण बनी जीवन दृष्टि इसीलिए समन्वय व संयम के संस्कारों की संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में देखना चाहती है । उसको हमारे पूर्वजों ने ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा’ ऐसा संबोधित किया है । भारत को इस दृष्टि के आधार पर समग्र, एकात्म विकास का अपना नया प्रतिमान उदाहरण के रूप में दुनिया के सामने खडा करना ही होगा ।
हिन्दू भाव व हिन्दू स्वभाव - एकता का आधार
हमारे राष्ट्र की चेतना यही सनातन दृष्टि है जिसे आज हम भारत के लोगों सहित सारा विश्व हिन्दू दृष्टि के नाम से जानता है । कोई विशिष्ट पूजा पद्धति, कोई विशिष्ट खान-पान, रहन-सहन, कोई सामाजिक या राजनीतिक मतवाद किसी विशिष्ट जाति, भाषा, प्रान्त इस की अनिवार्यता इसमें नहीं हैं । इन सब से उपर आध्यात्मिकता, मानवता तथा विश्वबन्धुत्व ही इस के लक्षण है । भारतीयों में इस भाव के विद्यमान होने से ही ‘भा’ याने ज्ञान के प्रकाश में रत भारत यह भारतीयता की एक परिभाषा बनी है । पूरे विश्व को जोड़ सकने वाले व जोड़ना चाहने वाले इस हिंदु भाव का स्मरण व पोषण भारत के प्रगति व एकता की अनिवार्य आवश्यकता है । भारत में इस भाव का रूप उत्कट भारत भक्ति, हम सभी भारतीयों में अपनी समान पूर्वज परंपरा का गौरव एवं आदर्श तथा भारत की सनातन संस्कृति के मूल्यबोध के अनुरूप स्वयं के जीवन को गढ़ते जाना यह है । प्राचीन काल से भारत भूमि पर निवास करने वाला जनसमूह इसी दृष्टि को लेकर एक समाज के नाते जीता आया है ।
हम सभी भारतवासियों की एकता - स्वाभाविक व बिना शर्त
हम सब का परस्पर नाता व भारत के साथ सम्बन्ध यह एक जीवमान सम्बन्ध हैं जो हृदय का होने से बिनाशर्त है । ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहें’ ऐसा एकतरफा है । अपनेपन के, आत्मीयता के अथवा रिश्ते-नातों के संबंधों में कोई शर्तें नही होती । बस, उन संबंधों के आधार पर पक्का रहना होता है । हमारे स्वाधीनता सेनानियों का राष्ट्र के प्रति ऐसा ही सम्पूर्ण बिनशर्त समर्पण रहा, तभी ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी हिंदु भाव को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सुसंगठित व बलसंपन्न समाज बनाने के लिए कार्य कर रहा है । व्यक्तिजीवन से विश्वजीवन तक की धारणा, प्रतिष्ठा तथा सुरक्षा भी बिना सामर्थ्य के संभव नही । अतएव संगठित व बलसंपन्न हिन्दुसमाज की बात करना या उसके लिए कार्य करना सर्व पंथ समादर की भावना अथवा राष्ट्र की भावनिक एकात्मकता के विरुद्ध नही है; हिंदू समाज का विचार व स्वभाव समावेशक होने के नाते ऐसा कार्य हम सब की भावनिक एकात्मता, सद्भावना व सदाचार का पोषक ही होगा यह बात समझनी चाहिए । पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा यह स्वभाव व संस्कार ही कैप्टेन स्मित मच्छार को अपनी प्राणों की बाज़ी लगाकर मनुष्यों के संरक्षण के लिए स्वयं को झोंक देने की प्रेरणा देता है।
सद्भावनापूर्ण व्यवहार आवश्यक
यह केवल विचार या वाणी की बात नहीं है । हम सभी के आचरण में यह भाव प्रकट होना चाहिए । हमारा भारत विशाल है । प्रकृति व पर्यावरण के विविध रूपों से सज़ा है । विविध पंथ, प्रान्त, भाषा, जाति, खानपान व रीति रिवाज़ों के मानने वाले समूहों से भरा बहुरंगी परंतु एक समाज है । परस्पर व्यवहार में, मन वचन कर्म में सद्भावना और अपनापन होना व दिखना चाहिए । गत काल के इतिहास से मनमे पड़ी एक दूसरे के प्रति आशंकाएं हमें दूर रखती है । इतिहास के उन तथ्यों को स्वीकार करते हुए भी गांठे सुलझ जाएँ, नयी न पड़े, ऐसा व्यवहार हमारा चाहिए । छोटी-छोटी बातों पर हमें उकसाकर झगड़े खड़े करने-कराने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए । इतने बड़े व विविधतापूर्ण समाज में यह वातावरण उत्पन्न होने में समय लगेगा । परन्तु देश व विश्व के कल्याण की इच्छा रखने वाले सभी को धैर्यपूर्वक अपने आप को तथा समाज को सम्हालते हुए कार्य करते रहना पड़ेगा । समाज के लोगों से बरतते हुए, हम सर्व साधारण व्यक्तियों से लेकर तो शासन-प्रशासन के लोगों तक, विशेषकर कोई विशिष्ठ अभियान अथवा नीति को समाज में लागू करने की बात होती है, तब अपना व्यवहार भद्र रहे, अपनेपन का रहे, नागरिक व्यक्तियों के सन्मान आदि का लिहाज करने वाला होना चाहिए यह ध्यान रखना चाहिए ।
इधर-उधर घटने वाली कुछ अवांच्छित तथा/ अथवा अप्रत्याशित घटनाओं को; जिन में संघ का न सम्बन्ध है न समर्थन; ले कर संघ की सद्भावना या हेतु की प्रामाणिकता पर संदेह उत्पन्न करने के प्रयास भी होते रहते है । संघ के कार्य का आधार शुद्ध सात्त्विक प्रेम है । संघ का कार्य स्वयंसेवकों के समर्पण एवं सेवा - परिश्रम के कारण चलता है । संघ को अपने स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए । एक सत्य को लेकर उसकी प्रतिस्थापना के लिये श्रद्धा विश्वास पूर्वक स्वयंसेवक लक्ष्य पूर्ण होने तक कार्य करते रहेंगे ।
आप सब की अच्छी तरह समझी इन बातों को इस लिए दोहरा रहा हूं क्योंकि समझदार लोग भी विचलित हों ऐसा वातावरण है अथवा खड़ा किया जा रहा है । भारत सहित सारे विश्व में जो जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट, उद्ध्वस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है । विश्व भर के तथाकथित प्रगत देश भी उस से त्रस्त, असहाय है । परन्तु पिछले दशकों में भारत ने स्वयं की शक्ति तथा सुनीति के कारण विश्व में धीरे धीरे अपना स्थान बनाया है। भारत के समाज का पुरुषार्थ सुदृढ़ नीतियाँ, नेतृत्व, देशाभिमान तथा विश्व के प्रति अपने दायित्व के बोध की जागृति के कारण सभी क्षेत्रों में यशस्वी हो रहा है । भारत की इस प्रकार की प्रगती के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजकता खडी कर अपने स्वार्थों की पूर्ती के लिए सहाय्यक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षडयंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे । इस वस्तुस्थिति को ये आसुरी ताकतें जानती है । इसलिए भारत ही उस का निर्णायक व सब से बलवान प्रतिस्पर्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है । भारत, हिंदू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं (dismantling) इस का विचार कर योजना बना कर वे कार्य करती हैं । उन्हींकी प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिये मिल जाते हैं । क्षुद्र सत्तास्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते है । अपने इतने बड़े समाज में समस्याएँ तो है । व्यवस्था की कमियाँ भी ढेर सारी होगी । उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है । परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए । आन्दोलन करने वाला समाज का कोई समूह हो, शांति व सुव्यवस्था कायम रखने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन-प्रशासन या राजनीतिक नेतागण हो, अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल चलन के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियाँ हों, यह ध्यान रखना चाहिए । वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो यह चिंता करनी ही पड़ेगी।
समाज के उद्यम से समाधान
समाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आन्दोलनों से ही समस्याएं सुलझती है ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता व आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।
संघ के स्वयंसेवक समाज में इस प्रकार का सामाजिक उद्यम खड़ा करने का प्रयास करते है। ग्रामीण विद्यालयों को ध्यान में रखते हुए स्वयंसेवकों के ऐसे प्रयासों का अनुभव उत्साहवर्धक है । 21 प्रान्तों के 210 जिलों में लगभग 1296 विद्यालयों में यह देखा गया कि जहाँ ग्रामवासियों का सहभाग व स्वयंसेवकों का साथ रहा वहां छात्रों की उपस्थिति, सीखने का स्तर तथा अभिभावकों की सहभागिता में सुधार आया । समाज ने शिक्षा सहायता तथा आधारभूत सुविधाओं के साथ साथ खेल व सांस्कृतिक तथा मूल्य आधारित गतिविधियों में भी योगदान दिया । ग्रामवासियों के सम्मिलित प्रयासों के आधार पर गावों के समग्र विकास के प्रयास तो हजारों ग्रामों में चल ही रहे है । देश भर में स्वयंसेवकों द्वारा चलने वाले सभी सेवा कार्यक्रमों में अपने देशबंधुओं में स्वाभिमान, स्वावलम्बन तथा राष्ट्र के जीवन में सहयोग - सहभाग की भावना बलवती बने; तथा उसे चरितार्थ करने की शक्ति एवं क्षमता उन्हें प्राप्त हो यह प्रयास होता है।
सजगता की आवश्यकता
इन प्रयासों के पीछे, समाज व देश को चलाने की जिम्मेदारी हमारी भी है, क्योंकि यह देश व समाज मेरा अपना है, यह अपनेपन की प्रेरणा रहती है । आंदोलनों के पीछे भी यही प्रेरणा होनी चाहिए । परन्तु जब ऐसी स्थिति न होकर आंदोलन राजनीति का साधन बन जाता है, किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोधी शत्रुभाव लेकर चलता है तब इसका लाभ भारत को दबाना चाहने वाली शक्तियां लेती है । मतभेदों को और गहरा बनाकर मनभेद उत्पन्न करना, समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में अन्यायग्रस्तता की (victimhood) भावना उत्पन्न करना आदि करते हुए देश में देश की व्यवस्थाओं के बारे में अश्रद्धा उत्पन्न करना, कलह, उग्र असंतोष, अलगाव, अव्यवस्था व अराजकता का वातावरण बनाना यह उन की कार्यपद्धति है । भारत को दबाये रखना चाहने वाली विश्व की शक्तियां भी कभी कभी इसमें अपना खेल करती रहती है । श्रीमती आशा भोसले जी के गाए, श्री पी. सावळाराम रचित एक बहुत पुराने मराठी गीत की आखरी पंक्तियाँ याद आती है।
“वाढवीत भेदभावा दुष्टतेचा फिरतो कावा
गाठूनिया भोळ्या जीवा अंधारात घालिल घावा”
(भोले-भाले लोगों को पकड़ कर भेद भाव बढ़ाते हुए दुष्टता अंधेरे में से आघात कर रही है।)
इसलिए – “चित्त नित्य सावध ठेवा एक लक्ष्यि लावून डोळे”
(सावधान हों कर लक्ष्य पर केंद्रित हो जाएँ।)
स्पष्ट है कि ऐसी विभेदकारी प्रवृत्तियों के द्वारा निर्मित बुद्धिभेद के चपेट से बचते हुए अपनी परस्पर सद्भावना की रक्षा करनी होगी । सावधान रह कर किसी प्रकार से उद्वेलित, उत्तेजित न होते हुए, भारत को विश्वगुरु पद पर देखने की अपनी आकांक्षा व लक्ष्य नित्य ध्यान में रखते हुए हमें प्रयासरत रहना होगा । आत्मीयता, अनुशासन तथा अपने राष्ट्रीय ध्येय के प्रति निष्ठा पर मजबूती से टिका समाज ही एकता को पाता है, तथा अपराजेय शक्ति को पाता है । संघ की यह प्रतीति है कि अपने समाज ने प्राचीन काल में अस्तित्व की एकता के सत्य को साक्षात किया, व इसी एकता की अनुभूति समय-समय पर विश्व को देने हेतु सभी का स्वीकार, सम्मान व प्रतिष्ठा करने वाले बहुरूप परन्तु एकरस जीवन को हमारा समाज जीता आया है ।
एकता के सूत्रों पर दृढ़ रहें
हमारे समाज के इस जीवन ध्येय को हमने ध्यान में रखा तब हम सभी विजयी हुए । जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल को हिंदू से मुसलमान को अलग करने के लिए विभाजित करना चाहा तब एक भूमि व एक समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का विरोध समाज से डट कर हुआ, ब्रिटिश सत्ता को अपना विभाजन का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा । उसी एकता व देशभक्ति के प्रतीक के रूप मे उस समय ‘वन्दे मातरम्’ का उदय हुआ । विभाजन परास्त हो गया । ऐसा 1947 में क्यों नही हो पाया? क्यों कि हम विशिष्ट है इसलिए हम अलग थलग है, हम अलग दिखते है इसलिए अलग ही है यह विचार; हमें बांट कर लड़ाते रखना चाहने वालों ने हमारे मन में बिठा दिया । सांप्रदायिक कट्टरपंथी विचारधारा के प्रभाव से हमने भी यह मन बना लिया कि अलग दिखते है इसलिए वास्तव मे भी हम एक नही, अलग ही है । अलगाव, राजनीतिक वर्चस्व की लालच तथा स्वार्थ सिद्धि के संयुक्त जुनून में हम, हमें एक बनाकर रखने वाले आधारों को क्रमश: नकारते चले गए । तुष्टीकरण की मानसिकता के कारण हमें तोड़ने वाली इस मानसिकता को हवा मिलती गई । देश विभाजन तक हो गया । लेकिन जिस शान्ति तथा अलग, स्वायत्त अस्तित्व के सुख की आशा दिखा कर यह दुष्टता का विभाजनकारी खेल किया गया, वह सुख-शान्ति तो मिली नहीं; उल्टे सीमा पर तथा देश में सदा के लिए अशांति, परस्पर अविश्वास, असुरक्षा व छोटे-छोटे कारणों से कलह हमने मोल लिया ।
बंग भंग के विभाजनकारी षडयंत्र को परास्त करने वाला वन्देमातरम आज भी वही एकता की प्रेरणा देने में सशक्त है । वह अपना राष्ट्रगीत है । उसे स्वाभिमान से, उच्च कंठ से तथा संपूर्ण गाने में कोई संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए ।
भारत की मातृभूमि के नाते भक्ति, हमारे समान भारतीय पूर्वजों के जीवन का गौरव व अनुकरण तथा हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के वैश्विक मानवीय मूल्यों के अनुसार अपने जीवन को ढालना यह हम सबको सदा एक रखते आये है । सभी पंथ, प्रान्त, भाषा, जाति आदि विविधताओं के अविरोधी तथा उनके परे यह सारे आधार है । इनके नित्य परिशीलन से इनको समझना व मन से अपनाना हमारी एकता के साथ साथ हम प्रत्येक की विशिष्टता को भी पुष्ट करते रहेगा । अपनी छोटी पहचानों पर खतरे की आशंकाओं से अथवा उनके अहंकार में भ्रमित हो कर; हमारी एकता के इन आधारों को छोड़ कर, बार बार वहीं ठोकर खाने की ग़लती हमें नहीं करनी चाहिए ।
अपने अपने छोटे अहंकार, अपने स्वयं की तथा अन्य लोगों की उपासनाओं के बारे में पाले हुए भ्रम तथा विविधताको अलगाव मानने की प्रवृत्ति को हमें त्यागना ही पड़ेगा । भारत भक्ति, पुर्वज गौरव तथा भारतीय संस्कृति के हम सभी को जोड़ने वाले इस त्रिसूत्र को मन से अपनाते हुए देश के लिए जीने की राह पर बढ़ना होगा ।
भारत का वैश्विक दायित्व व हमारे कर्तव्य
जिन समस्याओं के कारण आज विश्व त्रस्त एवं आतंकित है, उनके मूल में जीवन के दृष्टिकोण का अधूरापन है, वरना पुरुषार्थ के मामले में हम भी शेष विश्व से बहुत कुछ सीख सकते हैं । उन बातों को सीखने के साथ साथ अपनी राष्ट्रीयता का स्पष्ट स्वरूप समझते हुए उसको अंगीकार कर, अपनी एकता व गुणवत्ता को संजोकर, हम संगठित पुरुषार्थ में जुट जाए यह आवश्यक है । धर्म तत्व से विकास के पथ को सर्वांगपरिपूर्ण बना कर दुनिया को सुख और शांति की नई राह दे सकने वाला भारत खड़ा करना है। हमें अपने राष्ट्रीय मूल्यों के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को एक नया विकास पथ अपने उदाहरण से देना है । हम जीवन में जो भी करेंगे, वह गुणवत्ता में उत्कृष्ट ही होगा, समाज व देश की सुरक्षा, एकात्मता, सामाजिक न्याय एवं प्रगति - प्रतिष्ठा के लिए उचित ही होगा यह सजगता रखनी होगी । भारत का परमवैभव तथा विश्वगुरुत्व हममे से प्रत्येक के पुरुषार्थ से सिद्ध होनेवाला है । दूसरा कोई भी पर्याय अथवा छोटा रास्ता (shortcut) उपलब्ध नहीं है । अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक जीवनव्यवहार में नित्य छोटी-छोटी सत्कृतियों के द्वारा परिवर्तन लाते हुए सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी अपने कर्तव्य का पालन कर सकता है । पंचपरिवर्तन की पहलें व स्वयंसेवकों द्वारा चलायी गयी गतिविधियाँ इसी पद्धति से व्यक्ति को देशसेवा व भक्ति की राह पर कदम कदम बढ़ाती है ।
अपने कार्य के शतवार्षिकी के कार्यक्रमों को व लक्ष्यों को पूर्ण करने के पश्चात समाज की यह संगठित पुरुषार्थी विजयशालिनी शक्ति खड़ी करने की ओर संघ बढ़ेगा ।
“साध्य करना है हमे केशव प्रदर्शित ध्येय सपना ।
बस उसी की पूर्ति के हित हो समर्पित जन्म अपना ।।
तुष्ट माँ होगी तभी तो विश्व में सम्मान पा कर ।
बढ़ रहे है चरण अगणित बस इसी धुन में निरंतर ।।
ध्येय के पथ पर निरंतर” ।।
।। भारत माता की जय ।।