धर्म रक्षा हेतु प्राणार्पण करने वाले बलिदानी संत स्‍वामी लक्ष्‍मणानन्‍द सरस्‍वती जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    04-Nov-2026
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lakshmananand
 
 
 
राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मण्‍डल 2026
2,3,4 नवम्‍बर 2026, इन्‍दौर
 
सरकार्यवाह दत्‍तात्रेय होसबाले जी का वक्‍तव्‍य
 
धर्म रक्षा हेतु प्राणार्पण करने वाले बलिदानी संत स्‍वामी लक्ष्‍मणानन्‍द सरस्‍वती जी
 
भगवान जगन्नाथ की पावन भूमि ओड़िशा में समाज को दिशा देने में अनेक विभूतियों का योगदान रहा है। इसी कड़ी में अनुगुल जिले के गुरूजांग ग्राम में 18 अगस्त 1926 को जन्मे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्‍वती जी एक विलक्षण संत थे, जिन्होंने हिन्दू विरोधी शक्तियों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी।
 
स्वामीजी अपनी युवावस्था में प्रजामण्डल से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। विवाह के पश्चात् दीक्षा लेकर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और हिन्दू धर्म-शास्‍त्रों और संस्‍कृत व्‍याकरण का सूक्ष्मता से अध्ययन किया।
 
ओड़िशा के कन्धमाल में स्थानीय समाज में सक्रिय अराष्‍ट्रीय तत्वों के विरुद्ध खड़े रहने हेतु वे अपना केंद्र उसी क्षेत्र के चकापाद में बनाकर रहने लगे। स्वामी जी ने आध्यात्मिकता के अधिष्‍ठान पर जनजाति समाज की भौतिक उन्नति और अपनी संस्कृति के प्रति उनमें स्वाभिमान जागृत करने के व्यापक प्रयास किए। संस्‍कृत शिक्षा, महिला भजन केन्‍द्र, कृषि, गोपालन और जल संरक्षण के लिए जनजाति क्षेत्र के समाज को प्रेरित कर स्वामी जी ने उन्हें स्‍वाभिमान और स्वावलंबन का मार्ग दिखाया। शुद्धि यज्ञों का आयोजन कर वे जनजाति समाज को सदाचरण की प्रतिज्ञा कराते थे।
 
समाज की श्रद्धा के प्रतीक ‘’धरणीपेनु’’ की पूजा को समसामयिक सन्दर्भों के साथ प्रस्तुत कर स्वामी जी ने समाज की जड़ों को सुदृढ़ता प्रदान की।
 
भगवान जगन्‍नाथ की यात्राओं और यज्ञादि के आयोजनों द्वारा उन्‍होंने वहॉं के समाज में पुन: अपनी धार्मिक आस्‍थाओं के दृढ़ीकरण और परंपराओं के प्रति गौरव का भाव जागृत किया। इस हेतु उन्‍होंने जगन्‍नाथ जी के निर्माल्‍य, तुलसी के पौधे की मिट्टी एवं पत्‍तों तथा गंगा जल का उपयोग कर घर वापसी की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बना दिया।
 
स्‍वामी जी के इन प्रयासों के कारण वहॉं सक्रिय असामाजिक और अराष्ट्रीय तत्व असहजता का अनुभव करने लगे। उन्होंने स्वामी जी पर प्रत्यक्ष आक्रमण के अनेक प्रयास किये किन्तु स्वामी जी और भी अधिक दृढ़ता से पैर जमा कर अपना कार्य अनवरत करते रहे।
 
अंततः असहिष्‍णु मतांध शक्तियों ने जन्‍माष्‍टमी के पवित्र दिन जलेशपट्टा आश्रम पर आक्रमण कर स्‍वामी जी सहित चार अन्‍य शिष्‍यों की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी। महान बलिदानी संत स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन मातृभूमि तथा धर्म रक्षा के लिए समर्पित था। यह परम पवित्र कार्य ही उनके जीवन का उद्देश्य था। उनका व्‍यक्तित्‍व और उनके कृतित्व एक दूसरे से अभिन्न थे, जो उनके विचारों और आचरण की अटूट एकरूपता को प्रतिबिंबित करते थे। आज अनेक कार्यकर्ता उनके बलिदान की प्रेरणा को हृदय में धारण कर धार्मिक आस्‍थाओं के दृढ़ीकरण और परंपराओं के संरक्षण हेतु कटिबद्ध है। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ वेदांत केसरी स्‍वामी लक्ष्‍मणानंद सरस्‍वती जी की जन्‍मश‍ती पर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करता है।