देश में कुल 63,208 स्थानों पर 99,423 दैनिक शाखाएं लग रही हैं। इस वर्ष दैनिक शाखाओं की संख्या में 12,025 की वृद्धि तथा 8,156 शाखा स्थानों की वृद्धि हुई। कुल 26,826 स्थानों पर 34,982 साप्ताहिक मिलन और 13,363 स्थानों पर 14,096 मासिक मंडली लग रही है। साप्ताहिक मिलन संख्या में 2,712 तथा मासिक मंडली संख्या में 463 की वृद्धि हुई। पिछले वर्ष 93,156 कुल स्थानों की तुलना में इस वर्ष कुल 1,03,397 स्थान प्रत्यक्ष संघ कार्ययुक्त हो गए हैं।
स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, समाज-सुधारक, धर्म प्रचारक और शुद्धि आंदोलन के प्रखर नायक स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान के 100 वर्ष पूर्ण होने के निमित्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें आदरपूर्वक स्मरण करता है। पंजाब के जालंधर जिले के तलवन ग्राम में जन्मे स्वामीजी संन्यास दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् समाज जागरण के विविध कार्यों में जुट गए।
आज के इस युग में जिस परिस्थिति में हम रहते हैं, ऐसे एक-एक, दो-दो, इधर-उधर बिखरे, पुनीत जीवन का आदर्श रखनेवाले उत्पन्न होकर उनके द्वारा धर्म का ज्ञान, धर्म की प्रेरणा वितरित होने मात्र से काम नहीं होगा। आज के युग में तो राष्ट्र की रक्षा और पुन:स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि धर्म के सभी प्रकार के सिद्धांतों को अंत:करण में सुव्यवस्थित ढंग से ग्रहण करते हुए अपना ऐहिक जीवन पुनीत बनाकर चलनेवाले, और समाज को अपनी छत्र-छाया में लेकर चलने की क्षमता रखनेवाले असंख्य लोगों का सुव्यवस्थित और सुदृढ़ संगठन।..
स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए कोर्इ नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों। हर स्वयंसेवक ऐसे गुणवत्ता का बने इसके लिए संघ की सरल कार्यपद्धती है। संघ का समाज में प्रभाव अगर बढ़ा है और बढेगा तो केवल ऐसे स्वयंसेवकों के व्यवहार से ही बढेगा इसलिए स्वयंसेवक का संघ में स्थान अनन्यसाधारण ..
आज पुर देश में संघ का नाम बहुत फैला है परन्तु संघ के बारे में बहुत सारे लोगों को प्राथमिक जानकारी भी नहीं होती है। संघ की कार्यपद्धती अनौपचारिक तथा व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर होने के कारण प्रसार माध्यमों में तथा साहित्य में संघ के बारे में सही जानकारी भी बहुत कम उपलब्ध है। हिन्दू संगठन, संघ की सदस्यता, प्रचारक, संघचालक आदि संघ की परिभाषा ऐसे कई विषयों के बारे में लोगों के मन में कई भ्रांतियाँ होती है। इस प्रश्नावली से संघ की प्राथमिक जानकारी होगी है। वैसे तो संघ समझना तो संघ का प्रत्यक्ष अनुभव करना ..
१९२५ से चली अपनी दीर्घ यात्रा में संघ आज देश के शीर्ष और प्रभावी स्वयंसेवी संगठन के रूप में उभरा है। परन्तु इस कालखंड में काफी उतार चढ़ाव से संघ को गुजरना पड़ा है। समाज के सभी वर्गों से व्यक्तिगत संपर्क और ह्रदयपूर्वक संवाद की अपनी अनोखी कार्यपद्धति के कारण संघ ने बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से किया है। आपातकाल के समय जनतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष, या वंचित वर्ग के लिए समाजसेवा के हजारो प्रकल्प खड़े करने की योजना, ऐसे विविध विषयों पर कार्य करते समय भी संघ का लक्ष्य और ध्येय एक ..